बलरामपुर। बलरामपुर के खुले आसमान में लंबे समय बाद विशालकाय गिद्धों का झुंड देखा गया है। कभी विलुप्ति के कगार पर पहुंच चुके इन पक्षियों की वापसी ने न केवल पर्यावरण प्रेमियों और वन विभाग को उत्साहित किया है, बल्कि शोधकर्ताओं के बीच भी खुशी का माहौल बना दिया है।
गिद्धों को ‘प्रकृति का सफाईकर्मी’ कहा जाता है। ये मृत पशुओं के अवशेष खाकर पर्यावरण को स्वच्छ रखते हैं और एंथ्रैक्स व रेबीज जैसी बीमारियों के फैलाव को रोकते हैं। सोहेलवा वन्यजीव प्रभाग और आसपास के तराई जंगलों में इनकी उपस्थिति जिले के पारिस्थितिक संतुलन के पटरी पर लौटने का संकेत है।
विशेषज्ञों के अनुसार, पिछले वर्षों में गिद्धों की संख्या में गिरावट का मुख्य कारण पशुओं के इलाज में इस्तेमाल होने वाली डाइक्लोफेनाक दवा थी। इस दवा युक्त शव खाने से गिद्धों की मृत्यु हो जाती थी। अब सरकार द्वारा प्रतिबंध लगाए जाने, पशुपालकों में जागरूकता और वैकल्पिक दवाओं के इस्तेमाल से स्थिति में सुधार हुआ है। बलरामपुर में गिद्धों की वापसी इसी सकारात्मक बदलाव का परिणाम मानी जा रही है।
सोहेलवा वन क्षेत्र के आसपास इन विशालकाय पक्षियों की उड़ान ने वन्यजीव प्रेमियों और स्थानीय लोगों की उम्मीदें बढ़ा दी हैं। पर्यावरणविदों का मानना है कि यदि संरक्षण प्रजनन कार्यक्रम, सुरक्षित फीडिंग जोन और स्थानीय स्तर पर निगरानी को मजबूत किया जाए, तो बलरामपुर भविष्य में गिद्ध संरक्षण का एक महत्वपूर्ण केंद्र बन सकता है।
वन विभाग और पर्यावरण विशेषज्ञों ने ग्रामीणों से अपील की है कि वे गिद्धों को नुकसान न पहुंचाएं। यदि कहीं उनका घोंसला या झुंड दिखाई दे, तो इसकी सूचना तुरंत विभाग को दें, ताकि इन पक्षियों को सुरक्षित माहौल मिल सके।
गिद्धों की यह वापसी पर्यावरण के लिए एक सकारात्मक संकेत है और यह साबित करती है कि सही प्रयासों और सहयोग से पारिस्थितिकी तंत्र को पुनः स्थापित किया जा सकता है।



