
मथुरा।
परंपरा के अनुसार नंदगांव से बरसाना को होली खेलने के लिए निमंत्रण भेजा जाता है। इसके बाद हुरियारे नंदगांव पहुंचते हैं.कृष्ण-बलदाऊ के विग्रह संगहोली महोत्सव की शुरुआत हो जाती है। इस लट्ठमार होली में शामिल होने वाले लोग महीने भर पहले से ही अपनी तैयारियां शुरू कर देते हैं। हुरियारे और हुरियारिन सभी अपने-अपने परंपरागत वस्त्र पहन कर पहुंचे है। इस तरह सभी मुख्य मंदिर के प्रांगण में इकठ्ठा होकर होली के रसिया गाकर नगाड़ों की थाप पर लोग खूब झूमते हुए नजर आ रहे है।

बरसाना में लट्ठमार होली फाल्गुन मास की शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को हर वर्ष मनाई जाती है। मान्यता है कि बरसाने की महिलाओं की लाठी जिसके सिर में छू जाए वह सौभाग्यशाली माना जाता है। अगर आप भी राधा कृष्ण की नगरी में होली के उत्सव पर रंगों से सराबोर होना चाहते हैं तो यहांलट्ठमार होली का आनंद ले सकते हैं।
फागुन की शुरुआत होते ही हुरियारों का उत्साह पूरे मथुरा-वृंदावन में देखने को मिलता है। जिसमें गोकुल की ग्वालिनों ने कान्हा स्वरूप हुरियारों पर प्रेम में पगी छड़ियां बरसाईं जाती हैं। इस दौरान होली के गीतों से वातावरण प्रेममय देखने को मिलता है। शनिवार सुबह दस बजे नंद भवन नंदकिला से ठाकुर जी का डोला निकाला गया। जिस में डोला नंद भवन से बीच चौक, नंद चौक होकर मुरलीधर घाट पर पहुंचा। मंदिर के पुजारी मथुरा दास ने ठाकुर जी की आरती उतारी। गोकुल वासियों ने गली गली में डोला का फूलों की बरसात कर स्वागत किया।

डोला में गोकुल वासी मस्त होकर नाचते रहे। गोकुल के लोगों ने ठाकुर जी पर पुष्प वर्षा कर स्वागत किया। भक्त जयघोष करते हुए डोला के साथ निकले। गोकुल की ग्वालिन छड़ी लेकर डोला के साथ-साथ चल रही थी। हंसी ठिठोली करते हुए ग्वाल ग्वालिन गोकुल की गलियों से गुजरते हुए मुरलीधर घाट पर पहुंचे।
जहां ठाकुर जी ने पहली बार बंशी बजाई। वहीं छड़ी मार होली खेली गई। गोकुल की ग्वालिनों ने छड़ी मार होली ग्वालों के साथ खेली। गोकुल की होली में शामिल होने देश विदेशों से श्रद्धालु गोकुल पहुंचे। श्रद्धालुओं ने “बिरज में होरी रे रसिया”, “गोकुल की गलियों में मच रहा शोर”, “होरी खेलन आयो नंदकिशोर”, “मेरे चुनरी लग गयो दाग री ऐसो चटक रंग डारो” समेत कई गानों पर डांस किया। देर शाम ठाकुर जी की आरती उतारी गई।


