बलरामपुर। सीमावर्ती इलाकों की पहचान अब केवल जंगल, पिछड़ापन या उपेक्षा तक सीमित नहीं रहेगी। उत्तर प्रदेश सरकार के 10वें बजट में थारू संस्कृति संग्रहालय का उल्लेख इसी बदली हुई सोच का संकेत देता है। भारत-नेपाल सीमा से सटे बलरामपुर जनपद के सोहेलवा वन क्षेत्र के पास स्थित थारू बहुल गांव इमलिया कोडर अब थारू जनजाति की सांस्कृतिक विरासत के केंद्र के रूप में उभर रहा है। इमलिया कोडर में स्थापित थारू जनजाति संस्कृति संग्रहालय का हाल ही में लोकार्पण किया गया है। यह संग्रहालय थारू समाज की लोककला, पारंपरिक वेशभूषा, आभूषण, कृषि उपकरण, लोकगीतों और जीवनशैली को सहेजने का काम करेगा। लंबे समय से मौखिक परंपराओं तक सीमित रही थारू संस्कृति को अब स्थायी मंच मिला है, जिससे आने वाली पीढ़ियां अपनी जड़ों से जुड़ सकेंगी।बजट भाषण में सरकार द्वारा जनजातीय समाज की पहचान और उनके योगदान को सम्मान देने की बात कही गई थी। इसी कड़ी में थारू संस्कृति संग्रहालय को केवल एक सांस्कृतिक परियोजना नहीं, बल्कि पहचान और आत्मसम्मान से जुड़ी पहल के रूप में देखा जा रहा है। यह कदम दर्शाता है कि सरकार अब जनजातीय समाज को विकास की मुख्यधारा में सांस्कृतिक सम्मान के साथ शामिल करना चाहती है।
खुलेंगे रोजगार के नए रास्ते
इमलिया कोडर के ग्रामीणों से बातचीत की गई तो साफ महसूस हुआ कि इस संग्रहालय को लेकर लोगों में उत्साह है। बुजुर्गों का कहना है कि उनकी परंपराएं धीरे-धीरे खत्म होती जा रही थीं, लेकिन अब उन्हें संजोने का ठोस प्रयास शुरू हुआ है। युवाओं को उम्मीद है कि इससे न केवल पहचान मिलेगी, बल्कि रोजगार के नए रास्ते भी खुलेंगे।
पारंपरिक कला को मिलेगा नया बाजार
सोहेलवा जंगल की प्राकृतिक खूबसूरती के बीच स्थित यह संग्रहालय पर्यटन की दृष्टि से भी अहम माना जा रहा है। आने वाले समय में यह स्थल पर्यटकों को आकर्षित कर सकता है, जिससे स्थानीय हस्तशिल्प, लोकनृत्य और पारंपरिक कला को नया बाजार मिलेगा। इससे गांव के आर्थिक हालात में भी बदलाव की संभावना है।कुल मिलाकर, 10वें बजट में थारू संस्कृति संग्रहालय का जिक्र यह बताता है कि सीमावर्ती और जनजातीय इलाकों को अब केवल भौगोलिक नजरिए से नहीं, बल्कि सांस्कृतिक दृष्टि से भी देखा जा रहा है। इमलिया कोडर के लिए यह पहल विकास के साथ-साथ पहचान की नई कहानी लिखने की शुरुआत मानी जा रही है।

