अंकिता त्रिपाठी
लखनऊ। बसपा में पिछले 10 दिनों से चल रहे घटनाक्रम को अब मायावती ने एक बड़े राजनीतिक संदेश से जोड़ दिया है। आकाश आनंद को पार्टी की जिम्मेदारियों से हटाने, उनके ससुर अशोक सिद्धार्थ से राजनीति से संन्यास लेने की अपील और फिर आकाश को पार्टी से पूरी तरह अलग करने के बाद मायावती ने परिवारवाद को लेकर अपनी नीति साफ कर दी है। उनका कहना है कि पार्टी की जिम्मेदारी किसी परिवार की विरासत नहीं होगी। इसके साथ ही उन्होंने संगठन में युवाओं को करीब 50 प्रतिशत तक भागीदारी देने का संकेत दिया है।आकाश के बाद परिवार के दूसरे सदस्यों पर भी साफ किया रुख मायावती ने कहा है कि उनके छोटे भाई आनंद कुमार के दोनों बेटों को बसपा में कोई छोटा-बड़ा पद नहीं दिया जाएगा। इतना ही नहीं, आगे उनके बच्चों को भी पार्टी की जिम्मेदारी नहीं सौंपी जाएगी। उन्होंने साफ किया कि किसी एक व्यक्ति को संगठन में जिम्मेदारी मिलने का मतलब यह नहीं होगा कि उसके परिवार के दूसरे सदस्यों को भी राजनीतिक लाभ मिलता रहे। मायावती के लगातार बदलते फैसलों ने बसपा के नेतृत्व और भविष्य को लेकर सवाल खड़े किए हैं। 3 सितंबर की बैठक में आकाश आनंद को राष्ट्रीय संयोजक की जिम्मेदारी से हटाया गया था। इसके बाद 9 सितंबर को मायावती ने कहा कि अशोक सिद्धार्थ पूरी तरह राजनीति से संन्यास लें तो आकाश की पार्टी में भूमिका पर विचार किया जा सकता है। अगले ही दिन अशोक सिद्धार्थ ने राजनीति से संन्यास की घोषणा कर दी, लेकिन इसके कुछ घंटे बाद मायावती ने आकाश आनंद को भी बसपा से पूरी तरह अलग कर दिया।
2027 से पहले युवाओं पर दांव
आकाश आनंद के मामले के साथ ही मायावती ने संगठन में नई पीढ़ी को आगे बढ़ाने का संकेत दिया है। उन्होंने कहा है कि बसपा युवाओं को संगठन में करीब 50 प्रतिशत तक भागीदारी देने की प्रक्रिया पर काम कर रही है। उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और पंजाब के विधानसभा चुनाव में भी अच्छे और युवा चेहरों को उम्मीदवार बनाने को प्राथमिकता देने की बात कही गई है।
यानी एक तरफ पार्टी में परिवार के जरिए नेतृत्व आगे बढ़ाने की संभावना को सीमित किया जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ संगठन में ऐसे युवाओं की तलाश की जा रही है जो अलग-अलग सामाजिक वर्गों से आते हों और पार्टी के लिए काम कर सकें।
मायावती ने अपने परिवार को लेकर भी दिया उदाहरण
परिवारवाद पर अपनी नीति स्पष्ट करते हुए मायावती ने अपने राजनीतिक जीवन का उदाहरण भी दिया। उन्होंने कहा कि उन्होंने अपने भाई-बहनों और रिश्तेदारों को सांसद, विधायक या मंत्री बनाकर राजनीतिक लाभ नहीं दिया। उनका कहना है कि यह वही रास्ता है जिसे कांशीराम ने अपनाया था।मायावती ने कहा कि वह अविवाहित हैं, इसलिए छोटे भाई आनंद कुमार को साथ रखना उनकी जरूरत रही है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि उनके परिवार के सदस्यों को पार्टी में राजनीतिक लाभ मिलेगा। आनंद कुमार की बेटी दीपिका आनंद कानून की पढ़ाई कर रही हैं। मायावती ने कहा कि भविष्य में यदि उनमें क्षमता, निष्ठा और जिम्मेदारी निभाने की योग्यता हुई तो पार्टी उनके बारे में विचार कर सकती है। यदि ऐसा नहीं हुआ तो संगठन किसी दूसरे समर्पित कार्यकर्ता को जिम्मेदारी देगा।
बसपा के सामने अब सबसे बड़ा सवाल
मायावती के पिछले कुछ दिनों के फैसलों को एक साथ देखें तो यह सिर्फ आकाश आनंद को हटाने का मामला नहीं है। यह बसपा के भीतर परिवार से बाहर नेतृत्व तैयार करने की कोशिश के रूप में भी देखा जा सकता है।पहले आकाश आनंद को बड़ी जिम्मेदारी दी गई। फिर राजनीतिक परिपक्वता को लेकर उन्हें पीछे किया गया। इसके बाद उनके ससुर अशोक सिद्धार्थ को राजनीति छोड़ने की शर्त रखी गई और अंततः आकाश को ही पार्टी से अलग कर दिया गया। अब आनंद कुमार के बेटों को भी राजनीतिक जिम्मेदारी न देने की घोषणा ने मायावती की इस नीति को और स्पष्ट कर दिया है।2027 के विधानसभा चुनाव से पहले बसपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती संगठन को नए सिरे से खड़ा करने की है। पार्टी के पास फिलहाल विधानसभा में कोई विधायक नहीं है और ऐसे समय में मायावती युवाओं को संगठन में बड़ी हिस्सेदारी देने की बात कर रही हैं।

