बलरामपुर। प्राकृतिक सुंदरता, घने जंगल और दुर्लभ वन्यजीवों से भरपूर सोहेलवा जंगल अब सैलानियों के लिए आकर्षण का नया केंद्र बन रहा है। वन विभाग की ओर से बीते 10 सालों में लगातार पौधारोपण और संरक्षण की योजनाएं चलाई गईं, जिससे जंगल का दायरा 11 वर्ग किलोमीटर बढ़कर 463 वर्ग किलोमीटर तक पहुंच गया है। इसके साथ ही, जंगल में हरियाली बढ़ने और जल स्रोतों के संरक्षण से न केवल वन्यजीवों को सुरक्षित ठिकाना मिला है, बल्कि यह इलाका अब पर्यटन के लिहाज से भी विकसित किया जा रहा है।
प्राकृतिक सुंदरता खींच रही सैलानियों को
सोहेलवा जंगल अपने घने पेड़ों, पहाड़ी नालों और जलाशयों के कारण सैलानियों को आकर्षित कर रहा है। यहां की हरियाली और जैव विविधता इसे उत्तर भारत के प्रमुख वन क्षेत्रों में शामिल करती है। जंगल में बाघ, तेंदुआ, हाथी, लकड़बग्घा, हिरन और नीलगाय जैसे कई जंगली जानवर देखने को मिलते हैं। इसके अलावा, दुर्लभ पक्षी, तितलियां और औषधीय पौधे भी पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र बन रहे हैं।
पर्यटन को बढ़ावा देने की तैयारी में वन विभाग
सरकार अब इस इलाके को पर्यटन हब के रूप में विकसित करने की योजना बना रही है। वन विभाग की ओर से यहां इको-टूरिज्म को बढ़ावा देने, ट्रेकिंग ट्रेल्स विकसित करने और सैलानियों के लिए गाइडेड टूर की शुरुआत करने पर विचार किया जा रहा है। इसके साथ ही, जंगल में वन्यजीवों के संरक्षण और मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम करने के लिए भी नई योजनाएं बनाई जा रही हैं।
नेपाल सीमा से जुड़े जंगल की खास अहमियत
सोहेलवा जंगल बलरामपुर और श्रावस्ती जिलों में फैला हुआ है और इसे नौ रेंजों में बांटा गया है। खास बात यह है कि जंगल की सीमा नेपाल से जुड़ी हुई है, जिससे यहां जीव-जंतुओं की मुक्त आवाजाही बनी रहती है। यह जंगल अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वन्यजीव संरक्षण और पर्यावरण संतुलन के लिए भी अहम भूमिका निभा रहा है।
40 लाख से ज्यादा पौधे रोपे गए
वन विभाग के अनुसार, पिछले कुछ सालों में जंगल का विस्तार करने के लिए हर साल 35 से 40 लाख पौधे लगाए गए हैं। इनमें छायादार, फलदार और औषधीय पौधे शामिल हैं। साथ ही, जंगल के आसपास रहने वाले ग्रामीणों को भी इस अभियान से जोड़ा गया है, ताकि वे पर्यावरण संरक्षण में अपना योगदान दे सकें।