लखनऊ। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के अंदर उठे घटनाक्रम ने सियासी हलकों में हलचल बढ़ा दी है। वरिष्ठ नेता और आकाश आनंद के ससुर अशोक सिद्धार्थ को पार्टी से निष्कासित किए जाने के बाद संगठन के भीतर नई चर्चाओं का दौर शुरू हो गया है। इस घटनाक्रम ने चुनावी रणनीति, नेतृत्व और संगठन की एकजुटता को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए हैं। सूत्रों के मुताबिक, करीब 15 दिन पहले बसपा सुप्रीमो मायावती ने आकाश आनंद का राजस्थान दौरा रद्द कर उन्हें और पार्टी उपाध्यक्ष आनंद कुमार को लखनऊ बुलाया था। यहां लगातार तीन दिन तक विधानसभा चुनाव की तैयारियों और संगठन को मजबूत करने की रणनीति पर मंथन हुआ।
आकाश आनंद को मिल सकती थी बड़ी जिम्मेदारी
बैठक में आकाश आनंद को कार्यकर्ता सम्मेलन आयोजित कराने और संभावित प्रत्याशियों के चयन की प्रक्रिया में अहम भूमिका देने पर चर्चा हुई थी। हाथरस और जेवर में उनके कार्यक्रम भी प्रस्तावित थे, जिससे माना जा रहा था कि चुनाव में उनकी सक्रिय भूमिका होगी।बैठक के कुछ समय बाद मायावती ने प्रत्याशियों के चयन का अधिकार खुद अपने पास रखने का फैसला किया। इसके बाद आकाश आनंद की भूमिका सीमित होने की चर्चाएं शुरू हो गईं और प्रस्तावित कार्यक्रम भी आगे नहीं बढ़ सके।
समधी की विदाई ने बढ़ाई सियासी हलचल
इसी बीच आकाश आनंद के ससुर और वरिष्ठ नेता अशोक सिद्धार्थ को पार्टी से निष्कासित कर दिया गया। खास बात यह रही कि निष्कासन से पहले उन्होंने सोशल मीडिया पर मायावती के फैसलों का समर्थन किया था। इसके बावजूद हुई कार्रवाई ने राजनीतिक गलियारों में कई तरह की अटकलों को जन्म दे दिया।
नेताओं की चुप्पी से बढ़ा सस्पेंस
पूरे घटनाक्रम पर पार्टी के अधिकांश वरिष्ठ नेताओं ने सार्वजनिक रूप से कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है। संगठन के भीतर भी इस मुद्दे पर खुलकर कोई बोलने को तैयार नहीं है, जिससे चर्चाओं का बाजार और गर्म हो गया है।
चुनावी तैयारियों पर उठे नए सवाल
बसपा एक ओर दलित, ओबीसी और सवर्ण वोट बैंक को साधने की रणनीति पर काम कर रही है, वहीं दूसरी ओर संगठन के भीतर हुए इन बदलावों ने चुनावी तैयारियों पर सवाल खड़े कर दिए हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि विधानसभा चुनाव से पहले पार्टी के लिए संगठनात्मक एकजुटता बनाए रखना बड़ी चुनौती होगी। हालांकि बसपा नेतृत्व इसे पूरी तरह संगठनात्मक फैसला बता रहा है।

